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जीवन में जब पुण्यों का समुच्चय बनता है तो सुख शांति अपने आप आ जाती हैी प्रेमभूषण जी महाराज

आजमगढ जीवन में जब पुण्यों का समुच्चय बनता है तो सुख शांति अपने आप आ जाती है
 जब राम जी सहित चारों भाई विवाह करके अयोध्या जी पहुंचे तो पूरे नगर में सुख शांति की नदियां बहने लगीं और नगर वासी उसमें हर्षोल्लास के साथ बहने लगे। जब सुख शांति अधिक होने लगे तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सुख और दुख दोनों भाई हैं। एक अगर अभी उपस्थित है तो दूसरा भी यहां आने ही वाला है। जैसे जाड़ा और गर्मी का मौसम है। एक जाता है तो दूसरा आने की तैयारी करता है।
उक्त बातें उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला स्थित हरसिंहपुर, जीयनपुर, के शक्तिपीठ मां श्री शीतला धाम में निर्मित भव्य कथा मंडप में श्री राम कथा का गायन करते हुए चौथे दिन पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज ने व्यासपीठ कहीं।  
सरस् श्रीराम कथा गायन के लिए लोक ख्याति प्राप्त प्रेममूर्ति पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज ने रामकथा के चतुर्थ सत्र में कहा कि  जीवन में सब समय एक रस रहना बहुत कठिन है। इससे संबंधित महाभारत में भगवान कृष्ण जी के द्वारा कहा गया एक श्लोक भी है -सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। 
सुख और दुःख को समान समझकर, लाभ-हानि और विजय-पराजय को एक समान मानकर व्यवहार करने वाला व्यक्ति कोई महाज्ञानी हो सकता है। भगवान भोलेनाथ  अपने स्वाभाविक स्वरूप में ऐसे ही रहा करते हैं। जीव तो एक रस रही नहीं सकता है वह सुख में सुखी हो जाता है और दुख में दुखी हो जाता है यह जीव धर्म है। कर्तव्य पथ पर चलते हुए सम स्थिति में जीना बहुत ही कठिन है।
पूज्य श्री ने कहा कि श्री राम जी के विवाह के समय गुरु जी ने कहा तो चारों भाइयों का एक ही मंडप में विवाह संपन्न हो गया। गुरु तत्व के निर्देश का कोई विरोध भी नहीं हुआ। यही रामचरित का वैशिष्ट्य है। अंधकार को जो प्रकाशित करें उसे सद्गुरु कहते हैं।  गुरु केवल व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि गुरु तत्व होता है। ऐसा तत्व जिसके संसर्ग में आने के बाद किसी का भी कल्याण होता है। गुरु तत्वों के संपर्क में आने के बाद व्यक्ति की आत्मा ऊर्ध्व गति को प्राप्त होती है और सत्कर्म में गति करने लगती है।
श्री सीताराम विवाह से आगे के प्रसंगों का गायन करते हुए पूज्य श्री ने कहा कि कहा कि मनुष्य अपने कर्म बिगाड़ करके ही जीवन में दुख कष्ट और बीमारी प्राप्त करता है। मनुष्य को खासकर अपने विवाह के बाद अपने कर्मों के प्रति सावधान जरूर हो जाना चाहिए। कर्म करने में लापरवाही का परिणाम भी सामने आता है। सीखने के लिए एक अवस्था होती है जीवन भर बार-बार गलती कर करके नहीं सीखा जा सकता है।
 पूज्य महाराज श्री ने कहा कि जिसके पास जो होता है वह दूसरे को वही वस्तु दे सकता है। अपने कष्ट और दुख के लिए हम बेवजह भगवान को दोष लगाते हैं। भगवान किसी को दुख या कष्ट दे ही नहीं सकते हैं, क्योंकि उनके पास ना तो दुख है, ना कष्ट है। भगवान के पास कोई बीमारी भी नहीं है तो वह देंगे कहां से?
हमारे हाथ में केवल हमारा कर्म है। हमारे कर्म से ही हमारा प्रारब्ध बनता है। कोई भी व्यक्ति किसी और के भाग्य को बदल नहीं सकता है। क्योंकि उसका भाग्य तो उसके अपने ही कर्मों से बना होता है। कर्म का फल हर हाल में खाना होता है और सनातन धर्म विश्वास पर ही टिका है।
महाराज श्री ने कई सुमधुर भजनों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। बड़ी संख्या में उपस्थित रामकथा के प्रेमी, भजनों का आनन्द लेते हुए झूमते नजर आए।
शक्तिपीठ माँ शीतला धाम सेवा समिति के अध्यक्ष श्री धर्मेंद्र सिंह, श्रीमती डॉ कंचन सिंह, कथा आयोजक प्रशांत सिंह रवि, श्रीमती पूजा सिंह, पीठेश्वर संत लीलाराम दास जी, राजेश सिंह कल्लू , बालकरण यादव, सोनू सिंह, श्यामजीत चौहान, सनबीम स्कूल मुहम्मदाबाद के डायरेक्टर पंकज सिंह, आनंद तिवारी मुहम्मदाबाद, वैभव मिश्रा, जिला उपाध्यक्ष भाजपा आजमगढ़ अवनीश कुमार मिश्रा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई पदाधिकारी, अधिवक्ता अरुण सिंह, 
श्रीमान दिनेश मिश्र जी – एडीएम जनपद मऊ
श्री राजेंद्र पांडे जी– प्रधानाचार्य नागा जी विद्या मंदिर रसड़ा 
श्री गणेश त्रिपाठी – रसड़ा
संतोष सिंह टीपू 
सहित हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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