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भगवान किसी का त्याग नहीं करते मनुष्य स्वयं उनसे दूर हो जाता है - पूज्य श्री प्रेमभूषण जी महाराज


 आजमगढ श्री रामचरितमानस की में हमें यह बताया गया है कि भगवान की शरण में पहुंचने वाले हर व्यक्ति को भगवान स्वयं उसके सारे अपराध को क्षमा करके शरण में ले लेते हैं। भगवान किसी का त्याग नहीं करते हैं। यह तो मनुष्य का स्वभाव है कि वह स्वयं भगवान को भूलकर उनसे अलग हो जाता है। यह जीव धर्म है अर्थात इस संसार में रहने वाले जीव का अपना भाव विवेक और संस्कार है।
उक्त बातें उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला स्थित हरसिंहपुर, जीयनपुर, के शक्तिपीठ मां श्री शीतला धाम में निर्मित भव्य कथा मंडप में श्री राम कथा का गायन करते हुए पाँचवे दिन पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज ने व्यासपीठ कहीं।  
सरस् श्रीराम कथा गायन के लिए लोक ख्याति प्राप्त प्रेममूर्ति पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज ने रामकथा के पाँचवे सत्र में कहा कि मनुष्य के अपने कर्म ही उसके लिए अच्छा अथवा  मुश्किल परिस्थिति का निर्माण करते हैं। खासकर मनुष्य की जिह्वा इसमें बड़ी भूमिका अदा करती है। ज्यादा बोलने से ही झंझट उत्पन्न होता है। इससे बचने का एक सरल उपाय यह है कि अपने को भगवान में लगाए रखें। भजन में लगे रहेंगे तो जिह्वा को अन्यथा बातों के लिए समय ही नहीं मिलेगा।
महर्षि बाल्मीकि की यह शिक्षा मनुष्य को हमेशा याद रखने की  आवश्यकता है कि भगवत प्रसाद का रस अपने आप प्राप्त नहीं होता है, इसके लिए प्रयास करना ही पड़ता है। और जिस मनुष्य को इस प्रसाद का रस लग जाता है तो उसकी सभी कर्मेंद्रियां अपने आप भगवान में लग जाती हैं। और ऐसे ही मनुष्य का जीवन धन्यता को प्राप्त होता है।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान श्रीराम ने महर्षि बाल्मीकि आश्रम में यह  प्रश्न किया कि है महर्षि आप कोई उचित स्थान बताएं जहां पर हम निवास करें।  उत्तर में महर्षि बाल्मीकि ने उन्हें कहा -  प्रभु ऐसा कौन सा स्थान है जहां आप नहीं हैं?
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में कभी भी किसी कार्य के अपूर्ण होने से घबड़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि  हर कार्य का एक निश्चित समय होता है।  और अगर किसी कारण से वह कार्य पूर्ण नहीं होता है तो भी मनुष्य को अपने प्रयास बंद नहीं करने चाहिए।  हमारे सद्ग्रन्थ  हमें सिखाते हैं कि जीवन में मनुष्य के लिए उसका श्रम और उसका कर्म ही उसके भविष्य का निर्माण करते हैं।
महाराज जी ने कहा कि सत्कर्म के लिए जीवन में समय निकल नहीं पाता है इसे निकालना पड़ता है। और खास कर राम कथा तो मनुष्य के लिए एक ऐसा दुर्लभ साधन है जो भगवान की आतिशय कृपा और अपने पूर्व जन्म के पुण्य के आधार पर ही प्राप्त हो पाती है। पूर्व जन्म के पुण्य से अगर हम कथा मंडप में पहुंच भी जाते हैं तो कथा हमारे कान में नहीं जा पाती है, कान में जाने पर भी समझ नहीं आती है। इसके लिए प्रभु की ही कृपा जरूरी होती है।
महाराज श्री ने कई सुमधुर भजनों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। बड़ी संख्या में उपस्थित रामकथा के प्रेमी, भजनों का आनन्द लेते हुए झूमते नजर आए।

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