आजमगढ पटवध कौतुक प्राचीन शिव मंदिर परिसर में चल रही मानस कथा के दौरान भरत जी की रामभक्ति का प्रसंग सुनाया गया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथा वाचक महाराज ललित गीरी ने बताया कि भरत त्याग, समर्पण और निष्काम प्रेम के अद्वितीय प्रतीक हैं।
कथा में वर्णन किया गया कि जब राम को वनवास हुआ और अयोध्या का राजसिंहासन रिक्त हो गया, तब भरत ने न तो राज्य स्वीकार किया और न ही राजवैभव का लोभ किया। उन्होंने अपनी माता कैकेयी के निर्णय का विरोध करते हुए इसे अन्याय बताया और प्रभु राम को वापस लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान किया। चित्रकूट पहुंचकर भरत ने चरण पकड़कर राम से अयोध्या लौटने की प्रार्थना की, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पिता के वचन को सर्वोपरि बताया।
भरत की निष्काम भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण तब देखने को मिला जब वे राम की खड़ाऊँ को अयोध्या लाकर सिंहासन पर विराजमान कर स्वयं तपस्वी जीवन जीते हुए नंदिग्राम में रहे। उन्होंने राजपाट को सेवा मानकर संभाला और स्वयं को केवल राम का प्रतिनिधि समझा।
कथावाचक ने कहा कि भरत की भक्ति हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि त्याग मांगता है। भाईचारे, कर्तव्यनिष्ठा और आदर्श जीवन का जो उदाहरण भरत ने प्रस्तुत किया, वह आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।